प्रेमकी गंगा


.                  . प्रेमकी गंगा

ताः२६/१२/२०१५            प्रदीप ब्रह्मभट्ट

निर्मळ जीवन मील जाता है,जहां प्रेमकी गंगा बहेती है
प्रेम भावना रखके चले,जीवनमें ज्योतप्रेमकी जलती है
……..येही तो है इन्सानीयत,जीवन में भक्तिप्रेमसे मीलती है.
माया मोहका बंधन है जगमें,जहां कलीयुगकी केडी है
संभलके चलते जीवनमें.कुदरतकी क्रुपाही हो जाती है
प्रेमकीराह जगतमेंचलती,ना इन्सानको समझ आतीहै
कर्मका बंधन जीवको जकडे,ना कोई जीवको कहेती है
……..येही तो है इन्सानीयत,जीवन में भक्तिप्रेमसे मीलती है.
जन्म मरण ये तो है बंधन जीवका,नाकोइ दुर जाते है
आगमन हे बंधन कर्मका,जीवको अवनीपर ले आता है
परमात्माकी एक ही क्रुपा,जहां जीवको मुक्ति मीलती है
आवनजावनसे बच जानेसे,जीव प्रभुके चरणमे रहेता है
……..येही तो है इन्सानीयत,जीवन में भक्तिप्रेमसे मीलती है.

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